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मंगलवार, 31 जनवरी 2012

आवर्तिकाए : भाग 3

"मेरी और आवर्त की कुछ बातें जिनमे न छंद है
न ही लय न ताल है
बस जिन्दगी से जुड़े कुछ सवाल है
इन्ही बातो को मैंने नाम दिया है आवर्तिकाए" 


मैंने  पूछा  इतना  क्यूँ  लिखते  हो ........ "आवर्त"
कहने लगा खुद को  बयाँ करने  की  हसरत  रखता  हूँ  बस ....


भावुक  न  होना  देख  किसी  को  दुविधा  में .."आवर्त"
सांत्वना  की  जमीन  पर  फूंक  कर  रखना   कदम 
क्यूंकि  लोग  कहते  है  आज-कल
ये  मेरा  गम  वो  तेरा  गम .....................

शायद  दोस्ती-ख़ुशी-प्यार   इसे  ही   कहते  है ..."आवर्त"
हँसता  वो  है  चेहरा   मेरा  खिल  जाता  है ............:):)


लिखने  से  ध्येय  पूरा  नहीं  होता ........"आवर्त"
सिर्फ
"बहुत  अच्छा  सोचते  हो " कहते  है  लोग .......


सबको  साथ  लेकर  चलना  मुस्किल  है ..."आवर्त"
सबके  साथ  थोडा-थोडा  चला  कर..............


अक्सर  मैं   ये  सोचता  हूँ ...."आवर्त"
की  वो   क्या  सोचती  होगी ...................


अपनों  के  बीच  ऐसा  रम  गया मैं ..."आवर्त"
तेरी  याद  भी  न  आई  ...

‎दूसरे  की  ख़ुशी  में  खुश  हो जा...."आवर्त"
खुश  ही  रहेगा  हमेशा ....


उसके  बिना  खुश  रहना ..."आवर्त"
उसकी  खुशी  के  लिए  ही .......बड़ा  तड़पाता  है

काश!! ऐसा  हो  पता  ..."आवर्त"
जो  मुझे  भूल  जाता
में  भी   उसे  भूल  पता .........


आधीखुशी ........."आवर्त"
पूरी  होगी    देर  से  सही ........


झुंझलाता  क्यूँ  है ....."आवर्त"
अपनी  कसक  जब  किसी  की  कशिश  में  नजर  आती  है ....


इश्क  में  इंसान   मजबूर  हो  न  हो ...."आवर्त"
"मशहूर" हो  ही  जाता  है .....


आते  जाते  बातो  में ...."आवर्त"
ख्याल  तुम्हारा  दे  जाता  है  हर  कोई ....




जीवन  भर  जो  संजोया  है ..."आवर्त"
पल  भर  में  गवां  दोगे ............




आजकल  दोस्त  कहते  है  ...."आवर्त "
"मैं  कवि  नहीं मैं  क्या  बोलू"



सफ़र जारी है क्रमश : ......


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