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मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

कुछ इस तरह हो दिवाली इस बार की,

कुछ इस तरह हो दिवाली इस बार की,
अपने और दिल के करीब आ जाएँ.
सब पुराने शिकवे-गिले भूल जाएँ,
रोशन हो चेहरा "ख़ुशी" से ,
अँधेरा भटकाव का मिटायें.
दीप बाहर ही न जलाए,
प्रेम-दीपक मन में प्रकाशित हो,
हर कोने में रौशनी जगमगाए
रिश्तो की मिठास हो मिठाई से मीठी,
सब के चेहरों पे मुस्कान खिलाये
कुछ रौनक ऐसी हो इस "त्यौहार" की,
"खुशिया" बनी रहे "घर-परिवार" की
कुछ इस तरह हो दिवाली इस बार की ......



सभी मित्रो एवं उनके(मेरे ) परिवार को दिवाली  की हार्दिक शुभकामनाये ..:):):):):):)

मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011

कश-म-कश



दुआओ   से  एक  ख्वाइश  रंग  लायी  थी  मेरी ..

ख्वाबों  की  परिभाषा  साबित   हो   आयी  थी  मेरी ..

ख़ुशी  और   आंसू  झलक  आये  थे  ऐसे ..

एक  लम्हे  में ज़िन्दगी   उतर  आये  हो  जैसे ..



पर  महज एक  मंज़र  कहाँ  है  ज़िन्दगी,

हजारो  दिन-रात  का  उलट-फेर  है  ये  कहलाती .

कितने  लम्हे  है  जिनका  खुलना  अभी  है  बाकी,

कई एहसासों  में   घुलना  अभी  है  बाकी .



सब   कुछ   पास    है , जैसे  साथ हो  दुनिया  पूरी ,

फिर  भी  जाने   किसे  सुकून  से  हो  एक  दूरी .

भीड़  में  खुद  को  तालाश  लू  में  ऐसे,

मंजिल   का  है  पता  पर  रास्ते  से  अनजान  हूँ  जैसे.



पंछी  सी   आज़ाद  आसमान  में  उड़  जाऊ  कही,

फिर  हवाओ  सी   लहराऊ   तो  सही .

खो   जाऊ  अपनी   ही   धुन  में  इस  तरह,

की  दुनिया-दारी  की  तरंगो  से  न  टकराऊ  कभी.



या  रह  जाऊ  मैं   अपने  ही  जहाँ  में ,

ढालू  खुद  को  फिर  दुनिया  के  रस  में ,

जीत  पाऊ  बस  अपने   ही  आप   से ,

कोशिश  ऐसे  कर  पाऊ  में ...



कहा  खड़ी   हूँ ,कहा   तक  जाना  है ,

क्या   ये  कभी  जान    पाऊँगी    मैं ?

क्या  है  दिल  में , और  क्या  जुबान  पे   है,

क्या  चेहरों   के  मुखौटो को  पहचान   पाऊँगी  मैं ?



शांति  और  सुकून  जैसे  खोया  सा  है ,

तो  क्या  आशा-निराशा   से  फिर  परे  रह  पाऊँगी  मैं ?

लायी  थी  न  कुछ  साथ , न  ले  जाना   है ,





शनिवार, 8 अक्तूबर 2011

सार लिखूँ



कण कण व्याप्त हृदय में  भ्रष्टाचार  लिखूं ?

निजता  के  सूर्य  से  तपता  कटु-संसार  लिखूं ?
मनु-पुत्र  के  हाथो  ही  प्रकृति  का  संहार   लिखूं ?
हुए  जो  बेघर  बेसहारा  उजड़ता  उनका  परिवार  लिखूं ?
लोभी-क्रूर-क्रोधी  समाज  में  भावनाओ  का  व्यापार  लिखूं ?
विवादों  से  खेलता  मीडिया  उसका   व्यभिचार  लिखूं ?
सफ़ेद  पोश  नेताओ  से  भरे  कारागार  लिखूं  ?
गला  घोटते  भाई-चारे  का,  स्व-हित-हेतु  प्रतिकार लिखूं  ?
बसा  मृदु-मन  में  घनघोर  अन्धकार  लिखूं ?
.............................."आवर्त"..............................................
कुछ  पर   तो   कलम  घिसने  का  भी  अफ़सोस  होता   है .................
सो  पल  दो  पल  में  ढाई  आखर  का  प्यार  लिखूँ..
खुशियों  का  छोटा  सा  संसार  लिखूँ...
तेरी-मेरी   बातो  की  भरमार  लिखूँ.....
बुजुर्ग   हो  गये  अपने   संस्कार  लिखूँ .....
अपनी  ही  जीत  अपनी  ही  हार  लिखूँ........
२-४
पंक्तियो  में  मैं   तो  बस   ज़िन्दगी  का  सार  लिखूँ...........


गुरुवार, 6 अक्तूबर 2011

थोड़ा खुद से थोड़ा मुझसे बतियाना



जब  बातें  हो  जाये  कम,
आँखें  हो  नम,
आस  रखना, 
तब  तुम  मत  घबराना,
थोड़ा  खुद  से  थोड़ा  मुझसे  बतियाना,
चुप्पी  से  अपनी  न  मुझको   तड़पाना,
अपना  समझना  दिल  से  दिल  का  हाल सुनाना,
थोडा  खुद  से  थोड़ा  मुझसे  बतियाना,
जब  कभी   दिन  ढले  आराम  का,
रात  आये, मुश्किल  हो  रास्ता  काटना,
मेरी  बात  याद  रखना, 
दीप  लिए,  रोशन  मैं  रात  कर  दूंगा,
बस  तुम  एक  आस  रखना, 
कभी   न आशा  का  दीपक  बुझाना,
थोड़ा  खुद  से  थोड़ा  मुझसे  बतियाना, 
सन्नाटा  चंद  पलो  का  किसे  नहीं  भाता, 
पर तुम  चुप  हो  तो,
मुझे  भी  बोलना  नहीं आता,
मेरी  बातो  को  दिल से  मत  लगाना,
हो  कुछ  गिला  तो,
थोड़ा  खुद  से  थोड़ा  मुझसे  बतियाना . . . . . . .....

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