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शनिवार, 18 जून 2011

भाव-शून्य

निरर्थकता का प्रतीक हूँ,
सार्थक सत्य को खोज रहा
भावो से घिरकर, प्रयास मैं 
भाव-शून्य होने हेतु कर रहा !

प्रारंभ में ही था चला,
रुदन मेरे अंत का
क्षण भर में सीखा चलना
देख लिया गंतव्य  अपने पंथ का
प्रति क्षण घुलता रहा भाव में किसी
भाव-शून्यता तलाशता अब मैं कही !!

वास्ता किया अपनों से,
कभी किया अजनबी से किसी
किसी की कटुता और मिठास कभी,
भावो  का मायाजाल,
भ्रान्तिया  मेरे मस्तिस्क में बसी
भाव-शून्यता तलाशता अब मैं कही!!!

मित्रता और प्रेम से
भाव-पूर्ण कुशल-क्षेम से
भव्यता भाव की बढती रही
अब न चाहता हूँ भाव कोई 
भाव-शून्यता तलाशता अब मैं कही!!!

हो चुका में भाव-शून्य,
या उस विधाता ने है कोई मंत्रणा (साजिश) रची 
हो चुका मैं पूर्ण विमुख भावो से 
या कही न कही हृदय में एक राइ भाव  की है बची 
भाव-शून्यता तलाशता..........................क्रमश :







शुक्रवार, 17 जून 2011

प्रलय

समुद्र नीर खौलता,
सरू जल उफान पर,
आभास है प्रलय का ये,
या हो रहा सृजन !

बिजलिया है कौंधती,
व्योम घन फट रहे
मूसलाधार बरिशे ,
असमय ऋतु आगमन 
आभास है प्रलय का ये 
या हो रहा सृजन!!

रविवार, 12 जून 2011

सोच  तुझे  देख  कर  ही  मेरी  ख़ुशी
देख  तुझे  सोच  कर  ही  मेरी  हँसी.

जिंदगी  मेरी  जिन्दा  हुई  तुझसे  कहीं
कहीं  तुझ  में  ही   मेरी  जिंदगी  बसी .

पल  पल  जब  शाम  होती  जाये
रौशनी सूरज  की  मेरी  आँखों  से  छिप जाये
बस  एक  तेरी  याद  का  सहारा 
मेरी  आँखों  से  पल  पल  गिरता  जाए.
चमकते  मोती  बिखर  कर  आँखों  से
मेरी  तन्हाइयों को  रोशन  कर  जाए .

बस  तू  न  छिपना  कभी 
रहना  बनकर  मेरे  जेहन  एक  छाव  सी 
सोच  तुझे  देख  कर  ही  मेरी  ख़ुशी
देख  तुझे  सोच  कर  ही  मेरी  हँसी.



शुक्रवार, 10 जून 2011

आवारा पंछी


आवारा पंछी,
फिरता है यहाँ वहाँ,
आवारा पंछी,
कर दे कदमो में सारा जहाँ,
आवारा पंछी
डगमग -डगमग उड़ता रहा.
हवा के संग घुलता रहा .. आवारा पंछी .
होठो पे हर पल है हँसी
गाता ज़िन्दगी जो आँखों में है बसी ..
अआवारा . . .अआवारा पंछी.
क्या सच क्या झूठ संग उसकी ख्वाहिशो का जहाँ...
आवारा पंछी . .फिरता है यहाँ वह.
मिले मंजिल तो खुश है ..न मिले तो .
राह से ही जिन्दगी चली.
खिल जाए गुलाब हँसी का कभी..तो कभी मुस्कान की नन्ही कली.
आवारा पंछी.






पंछी आवारा

गुरुवार, 9 जून 2011

सूखा पत्ता


पत्ता सूखा सा, पड़ा रहा सड़क पर
थोडा पीला,थोडा काला सा
कभी हरा था पेड़ की किसी शाख पर
पत्ता सूखा सा, पड़ा हूँ अब सड़क पर
मौसम जितने आते है
हाँ , हर साल कुछ और
पत्ते सूखे, मेरे साथ शामिल हो जाते है
कुछ सूख़ कर धूप की गर्मी से,
तो कुछ मारे जलन के जल जाते है ...
अकड़ थी मुझ मे भी
जब हवा का झोका, कोई तूफ़ान
हिला न पाता था
लेकिन वक़्त की धार ने सबको कुंद किया है
बचते बचाते एक दिन गिर ही पड़ा
मैं पत्ता सूखा सा , सड़क पर ...............इंतज़ार में एक हवा के झोंके के
जो ले जाये मेरी किस्मत की ओर मुझे
या मेरी मंजिल की तरफ ये उसकी है मर्ज़ी
जो भी उसे सूझे ...........तब तक सूखा पत्ता सा मैं सड़क पर ....क्रमश;






सूखा मैं ....

:)
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