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गुरुवार, 9 जून 2011

सूखा पत्ता


पत्ता सूखा सा, पड़ा रहा सड़क पर
थोडा पीला,थोडा काला सा
कभी हरा था पेड़ की किसी शाख पर
पत्ता सूखा सा, पड़ा हूँ अब सड़क पर
मौसम जितने आते है
हाँ , हर साल कुछ और
पत्ते सूखे, मेरे साथ शामिल हो जाते है
कुछ सूख़ कर धूप की गर्मी से,
तो कुछ मारे जलन के जल जाते है ...
अकड़ थी मुझ मे भी
जब हवा का झोका, कोई तूफ़ान
हिला न पाता था
लेकिन वक़्त की धार ने सबको कुंद किया है
बचते बचाते एक दिन गिर ही पड़ा
मैं पत्ता सूखा सा , सड़क पर ...............इंतज़ार में एक हवा के झोंके के
जो ले जाये मेरी किस्मत की ओर मुझे
या मेरी मंजिल की तरफ ये उसकी है मर्ज़ी
जो भी उसे सूझे ...........तब तक सूखा पत्ता सा मैं सड़क पर ....क्रमश;






सूखा मैं ....

:)
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