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मंगलवार, 22 जून 2010

मुरझाया गुलाब

7:45 AM
आज सुबह  जब  विक्रम*  में  चढ़ा  तो देखा   बैग  कि  सबसे  आगे  की  जालीदार  जेब  में  एक  गुलाब का मुरझाया  फूल  पड़ा  हुआ  था!

तो  उसे  देखकर  मुझे  थोडी  सी  कल  की  बातें  याद  आई  "वैलेंटाइन्स दिवस"  कि बात है,वो  फूल  अपूर्व  ने  मुझे  बस  की  सीट  के  नीचे  से  उठाकर  दिया  था,ये  कहते  हुए  की  "ये  कोई  तरीका  है  तुम  फूल  तोड़  के  कहीं  भी  फ़ेंक   दो जब  किसी  ने  कुछ  दिया  है  तो  कद्र  करो"

फिर वो फूल मैंने रख लिया था ।
फिर  उसके  बाद  मैं   वापिस अपने  ख्यालो में खोया हुआ  विक्रम  में  था।
उस  फूल  को  देख  रहा  था और  मेरे  हाथ मेरे  फ़ोन  पर  चल  रहे  थे।



एक  फूल  पड़ा  हुआ  था  मेरे  बैग  की  जेब  में
मुरझाया,अशक्त,ग़मगीन
देख  कर  उसको  मैंने  पूछ  लिया
तुम्हारी  भी  क्या  ज़िन्दगी  है
कितने  हाथो  से  गुजरकर  आखिर  खो  जाओगे
जीना  सिर्फ  दो  क्षण  का  तुम्हारा
अब  कहा  पाओगे
अचानक  एक  आवाज़
खिली  हुई,जानदार,उत्साहित गूंज उठी
मेरे  अन्तर्मन  में

“मुझे  मुरझाना  पसंद  है
मुझे  टूट  जाना  पसंद  है
मुझे  सबके दिल को भाना पसंद  है”

मैं  चौंका, देखा  इधर-उधर
ये  आवाज़  किधर  से  आई  है
वो  गुलाब  जो  मुरझाया  था  बोला
इधर  देखो भाई  मैंने  आवाज़  लगाई  है
तुम  कौन  सा  जीकर  भी  पूरी  अपनी  जिंदगी
किसी  को  सुख   दे  पाते  हो
हमेशा  ही  तो  जो  चाहते  है तुम्हें
उन्हें  ही दुखाते  हो
पर  मुझे  जो  चाहता  है
रहता  है  हमेशा  प्रसन्न
क्या  हुआ  जो  जिंदगी  है  मेरी केवल  दो  क्षण
ये  दो  क्षण  ही  मेरे  है  सार्थक,करते तृप्त मन

जिसने  सीचा
जिसने  थोड़ा
जिसने  सजाया
जिसने  बिखेरा
जिसने  कुचला

सभी  ही  तो  मेरी  दो  पल  की
कहानी  के  गवाह  है।

ना  वो  हैं दुखी  मेरे  कारण
वरना  जीना  मेरा  निरर्थक  है
उसके  सूखे  लबो  से  इतनी  कोमल
ध्वनि  में  इतनी  बड़ी  सीख  की  अपेक्षा  न  थी
पर  वो  यही  नहीं  थमा

मेरे  प्रश्न  को  वो  गंभीरता  से  ले  बैठा
पूछा  था  जो  प्रश्न  मैंने  उसे
वो  मुझसे  ही  पूछ  बैठा
मैं  निरुत्तर था  फिर  भी  हार  नहीं  मानी
सुना  दी  उसको अपनी  स्वार्थी  कहानी
की हम  तो  ख़ुशी  के  हकदार  बनते  है
पर  तुम  तो  निस्वार्थ  बुनते  हो  ख़ुशी के  पल
ना  है  तुम्हें  चिंता  क्या  होगा  कल
हर  कोई  तुझे  उठाता-पटकता  खुश  होता  है
और  तू  हमारी  ख़ुशी  में  खुद  को  खोता  है
मेरी  पुरानी  आदत
जो  न  देती  है  जरा  भी  माहौल  समझने  की  इज़ाज़त
मै  बोलता  जा रहा  था
राज  दिल  के  खोलता  जा  रहा  था
देखा  एक  पल   उस  गुलाब  को
वो  सन्नाटे  में  कही  खो  चुका था
खुशबू  विलीन  वातावरण  में  मृत  वो  हो  चुका  था
अब  भी  उसकी  पंखुडिया  मुझे  उसकी  यात्रा  की  याद  दिला  रही  थी
मेरे  अपनों  के  बीच  उसके  विचरण  की  लघुकथा  सुना  रही  थी
मेरा  अंतिम  सलाम  था  उसके  सुर्ख  शारीर  को  सहेजना
उसको  तो  हमेशा  ख़ुशी  ही  बाँटनी  थी
निष्प्राण  होकर  भी  कर  रहा  अपने  जीवन  को  सार्थक  वो
ख़ुशी  बाँटते,महसूस करते  सो  चुका  था  जो …

8:15 AM
विक्रम  से   उतरा  थोड़ी  देर  खड़ा  रहा  मेरी  कॉलेज  बस  आ  गयी  थी  में  उसमे  चढ़ा और  आम दिनों की तरह कॉलेज  की  ओर निकल पड़ा ………..

विक्रम* : देहरादून की  स्थानीय सवारी और जगहों पर इसे टमटम या जुगाड़ नाम से भी जाना जाता है।  

शुक्रवार, 18 जून 2010

पहली ख़ुशी

-->

दोस्तों , ये मेरी पहली कुछ पंक्तिया हैं जो कि मैंने अपने back paper से पहले लिखी थी और उसके
बाद से में कुछ न कुछ विचित्र, अजीब और पकाऊ लिखता गया !!!!!!!!!!!!!!!






so plz check my first few lines........




जहाँ तक दिखी सड़क
वह तक चलता गया मैं
चलता ही गया मैं
चोराहे मिले बहुत
पर बिना सोचे समझे
चलता गया मैं
चलता ही गया मैं
कभी बहकावे में तो कभी होश में
दिन के उजाल़े और रात के आगोश में
चलता गया में
बस चलता ही गया में
कुछ पल के लिए ठहरा में
भटका कुछ हसीं चेहरों के पीछे
बैचैन हुआ किसी कि नजरों पर
पर जैसे ही दिखी सड़क
चलता गया में
बस चलता ही गया में
गमों को झेलता हुआ
ख़ुशियो को उडेलता हुआ
थका न मैं
अपने आप को सम्हलता गया मैं
जहा तक दिखी सड़क
वह तक चलता गया मैं
बस चलता गया मैं
अभी भी चल रहा हूँ
स्थिर हूँ या नहीं
कल भी चलता रहूँगा
चाहे रहूँ या नहीं...............
:)

सोमवार, 14 जून 2010

bla bla...........kisi ki chupi baatein

      
All ma lyf dere hav been incidents wich hav made me feel guilty ,some actions hav disturbed me…..some questions unanswered!!!!some topics undiscussed…..at every point of lyf I hav faced myself as an ill characterfrom ,whom I hav alwayz tried to run away…..i hav been successful in hiding dis inner demon from my near n dear ones…..but now it seems to b uncontrollable….im unable to hide it anymore……it has started to overshadow my conscience….its becoming difficult for me to keep it chained wid ma inner

Strength….i need frenz to help me out…..recently in tryin to b a gud frend dis inner atrocious demon overcame my senses n disgraced me…..some frenz hav now become aware of my vicious character….n I am no longer able to hold such dreadful flaw in me………I want everyone to my real identity……d real voluptous me…….i don’t people to take me as a humble character….because I am not….i wont be able to take anymore blames n I don’t want to be d reason of my frend's suffering anymore……..i'l neva b able to forget watt I did wid ppl…who trusted me n shared der thots n secrets wid me….maybe I'l neva b able to win d war dat I hav fot wid ma inner demon since a long tym……I want dat ppl should b aware of inner demon n nt misjudge ma character ……..i am not a gud human being,n I want ppl to know dat…d guilt is unbearable for me……I hav alwayz tried to b god human but every tym I hav failed….maybe I shud try not talkin to ppl n create a distance wid everyone…..atleast den many ppl will nt b hurt….i hav been in d company of many who hav encouraged n strenghthened my hidden demon….i hav misjudged ppl to b a help……whom I shud hav avoided….became my idol….dey did dere best to demoralise me……thanx to dem…..i hav bcm a dreadful character who is a harm to d society…. I hav becom smthing I alwayz feared to be……I know no one can help me…..wenever um alone dese thots roam in ma mind…..dats a reason y I don’t like being alone……but now it seems dat loneliness may be a cure to dis disease…….i don’t want to be lonely but den I cant see ma frenz being hurt n still dey try not to blame me for dat……may be dis is wat lyf has for me in mind…I have loved ma frenz n in lovin dem I hav most of d tyms done things wich r wrong…….n the most troubling fact is dat I know dat I hav done so many wrongs In lyf till date……..n many I'l do in d coming years…..its something dats hurting…………...

it's not me
it' appy

विश्वास


उलझने  ज्यादा  राहते  कम  है 
उम्मीदें  ज्यादा  चाहतें   कम  है 
फिर  मिली  एक  रौशनी 
अब  उजाल़े  ज्यादा  अँधेरा  कम  है 
जिंदगी  ज्यादा  डर  मौत  का  कम  है 
ख़ुशी  ज्यादा  दर्द  दुःख  का  कम  है 
मंजिल  साफ़  है  भटकाव  कम  है 
पास  गया  उस  रौशनी  के  तो  पता  चला 
वो  खुद  में  बहुत  कम  है 
उसमे  भी  द्वेस  जादा  प्रेम  कम  है 
अन्धकार  ज्यादा   रौशनी  कम  है 
सवाल  ज्यादा  जवाब  कम  है 
दुविधा  ज्यादा  विकल्प  कम  है 
वो  रौशनी  जो  प्रकाशित  थी  मेरे  मन  में  बुझ  रही  थी 
लेकिन  पहले  मुझसे  आकर  पास  वो  मेरे  बोली 
मैं  प्रकाशित  तुजसे  थी 
“तेरी  आशा 
तेरी  प्रेरणा 
तेरा  उत्साह 
तेरा  विश्वास“
मुझे  हर  पल  दे  रहा  उर्जा   था  
क्यूंकि   इस  दुनिया  में  बुराई  बहुत  ज्यादा   और  अच्छाई बहुत  कम  है 
अब  न  रौशनी  को  न  मुझे  कोइ  गम  है 
उसमे  है  जो  अच्छाई  भले  ही   वो  कम  है 
मैं  भी   हूँ   उत्साहित   मेरा  मन   अब  सम  है 
वो  प्रकशित  रहे  हमेशा  उज़ाला फैलाये  चाहे  उसमे   रौशनी  कम  है !!!!

दोस्ती

सहजता की सीमा है  दोस्ती

बेशर्मी  की  हद   है  दोस्ती 
एक  दूसरे  के  अस्तित्व  को  खोजना  है  दोस्ती 
गुस्सा  लड़ाई  हँसना  हँसाना  है  दोस्ती 
जीवन  से  जादा  जीती  है  दोस्ती 
किसी  का  कन्धा  किसी  का  सर  है  दोस्ती 
खुशी  में  आंसू  और  गम  में  हँसी  है  दोस्ती  
रात  में  रौशनी  है  दोस्ती 
धूप  में  shower  है  दोस्ती 
प्यार  का  tower है  दोस्ती 
ना  जाने   क्या-क्या  है  दोस्ती 
अगर  एक  दोस्त  न  हो  तो   फिर  क्या  है  दोस्ती 
केवल  एक  भावहीन  शब्द  है  दोस्ती 

Thanks to all my “दोस्त” for making “दोस्ती” wrd special for me
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