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बुधवार, 27 अप्रैल 2011

तन्हाई और तू



मेरी तन्हाई मुझे भाती थी

बातें चलती थी

और वो सिर्फ सुनती जाती थी

एक दिन फिर तुम आई

खिलखिला के टूटी तन्हाई

धीरे से साथ छोड़ा उसने

अकेले में साथ दिया था जिसने

अब तुम थी

और बातें चलती मैं सुनता जाता था

पल बीते कुछ और मेरी आदत जाती रही बोलने की

पर इस पल छूटा तेरा साथ इस कदर

तब टूटा मेरा सब्र . .जाने के बाद तेरे

अब न है कोई दरम्या तन्हाई और मेरे

अब दोनों एक दूजे को सुनने की कोशिश करते है . . . .:):)
Reactions:

8 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

कल 13/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुन्दर

prerna argal ने कहा…

तन्हाई पर लिखी बहुत सुंदर और अनोखी रचना बहुत बहुत बधाई आपको




please visit my blog
www.prernaargal.blogspot.com

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति...
सादर...

अमित रावत ने कहा…

सभी का तहे दिल से शुक्रिया मेरी कविता आप जैसे बड़े कद के कलाकारों की टिप्पणी पाकर धन्य हो गयी ..:):)

सागर ने कहा…

bhaut hi acchi rachna....

अमित रावत ने कहा…

sukria sagar ji

sushma 'आहुति' ने कहा…

बहुत ही खुबसूरत से तन्हाई को अपने शब्दों द्वारा बयाँ किया है....

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