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रविवार, 22 जनवरी 2012

फुर्सत में यू ही

आह !!!
दिन भर फेसबुक  पर  बर्बाद करने के बाद , पूरा दिन एक नई कविता की रचना के baare में सोचते सोचते , थोडा सा टीवी देखने के बाद जब खुद से बोर हो  गया  हूँ तो लिखने बैठा हूँ!!

हमेशा की तरह आज भी नहीं पता की क्या लिखूंगा बस एक कोशिश है खुद को खुद के सामने रखने की
यू तो मैं सुबह से सोचकर  बैठा था  की आज एक गीत जरुर लिखूंगा पर जब कुछ सोचकर करने बैठो तो कुछ भी नहीं होता है !!!
आज जब कुछ दोस्तों की कविताये पढ़ी तो अपने जीवन के भी कुछ क्षण याद आये की जब कोई मुझे पड़ता है तो क्या वो भी वैसे ही सोचता होगा जैसे की मैं, जो दो कविताये मैंने पड़ी उनमे मुझे एक में प्रेम की वेदना तो दूसरे में खुद से कुछ शिकायते और अपूर्णता का एहसास हुआ !!
क्या वो पंक्तिया उसी उदेश्य से लिखी गयी थी जो मैंने समझा या फिर वो मात्र एक काल्पनिक अभिव्यक्ति थी !!
क्यूंकि मेरे लिए लिखना खुद को व्यक्त करना है लेकिन दुःख व्यक्त करना भी दुःख को बढाना ही होता है !!
तो जब भी सोचो  तुम दुखी हो कुछ भावुक हो!!

"उठाओ कलम और शुरू हो जाओ
महसूस जो तुमने किया है जग को बताओ
बस ख्याल रहे इतना गम ही गम न व्यक्त करना
खुश मिजाजी से ख्यालो को भरना
कसक  हो दिल में सबको जता देना
लेकिन फर्क तुम्हे नहीं है ये भी बता देना
क्यूंकि शायद  तुमको भी पता नहीं 
 तुमको भी गम से अपने फुर्सत नहीं "

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