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गुरुवार, 10 मार्च 2011

सूखे वृक्ष



साथ सूखे वृक्षों की कतार

वक़्त बीता बरसो का . . . .

न आई उन मे बहार . . . .

रोज सुबह करते ओस की बूँद का इंतज़ार . . .

पर न फूटी अब एक भी कोपल जिसमे बसा हो प्यार . . .

रोज सुबह भीग कर तरबतर ओस में . . .

सपने सोचते . . .

आंसू मिले ओस में पोछते . . . .

यु ही बरसो और बीत गये . . .

मौसम न जाने कितने निकले . . .

बसंत उनका कभी न आया . . . .

बसा रहा उनके तनों में काला साया . . . .

वो महसूस करते हर धूप . . .

पर करने छाव उनकी डाली पर . . .

एक भी पत्ता न आया . . . .

आज मेरी नजर पड़ी उनपर . . .

मैंने अपने और उनमे कुछ जादा अंतर न पाया . . .

पर देखते ही मेरे एक चमत्कार हुआ . . . .


अगली सुबह निकली कोपल नयी . . .

मुझे भी आश्चर्य हुआ . . . . . . .

पर पता चला वो चमत्कार था . . .


उस एक पेड़ के गिरने का फल . . . .

हरे भरे होने लगे वो जो सूखे थे कल . . . . .

क्यूंकि उनका दोस्त गिरा उनके लिए . . .

उनकी जड़ो में दे गया प्रेम की उर्वरा शक्ति . . . . .

अब पंछी चहेकते और छाव लगती.

दोस्ती और प्रेम की शक्ति.................




KHUSH!DOST!AM!T.....:)












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