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शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

कुछ और सही.......

हकीकतों के दामन को,
पकडे रखना बच्चो का खेल नहीं,
गर लगता है डर हकीकत से, तो चलो
हकीकत से आगे कुछ और सही......... ।
प्यार निभाना न जान पाए कभी हम,
रिश्तो की भी पहचान हमे नहीं,
अब तो खुद से भी कट कर रहता हूँ मैं,
चलो जिंदगी से आगे कुछ और सही....... ।
निराशा आशा के अंतर्द्वंद में ,
कौन है सही जानना आसान नहीं,
निराशा रात है उस अगली सुबह के लिए ,
गर सुबह न मिले तो चलो शाम ही सही..... ।
पहचानने की चाहत में खुद को,
भूल सकता अपनी चाहत को नहीं,
गर उम्मीदों के काफिले चल चुके काफी आगे,
आओ तय करें रास्ता उनके पीछे ही सही..... ।
ख्वाबों के आँगन में नाचते मन को,
देखकर भी भरता सूनापन मेरा नहीं,
कुछ पलों की बिसात पे बीचा दूं सब कुछ
इस अकेलेपन में यादों का सहारा ही सही.... ।
हुयी जो भी गलतियाँ, जो रहे शिकवे गिले,
उन्हें भुलाकर आगे बढ़ना मुमकिन नहीं,
पर ठीक उन्हें कर आगे ही बढूँगा मैं,
चाहे इस राह पर शूल लाखों ही सही.....
इस बार इन सबसे आगे कुछ और सही..........
कुछ और सही............



आपको एक और भेंट,
संपूर्ण ख़ुशी!!!!!!!!!!!!!
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